शराब नीति और राजस्व का गणित: क्या पब्लिक हेल्थ और कमाई के बीच संतुलन संभव है? जानें एक्सपर्ट की राय

नए साल के जश्न के साथ ही एक बार फिर ‘शराब नीति’ पर बहस छिड़ गई है। शराब कई राज्यों के लिए राजस्व (Revenue) का सबसे बड़ा स्रोत है, लेकिन इसके सामाजिक नुकसान (सड़क दुर्घटनाएं, स्वास्थ्य समस्याएं) भी कम नहीं हैं। राज्यों के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह है कि वे शराब को ‘कमाई का जरिया’ मानें या एक ‘विनियमित सामाजिक बुराई’।

एथिल अल्कोहल आधारित कराधान: अर्थशास्त्र का सिद्धांत (Pigouvian principle) कहता है कि किसी वस्तु पर टैक्स उसके द्वारा होने वाले नुकसान के अनुपात में होना चाहिए। वर्तमान में भारत में बीयर (कम नशीली) पर टैक्स, हार्ड स्पिरिट (व्हिस्की आदि) की तुलना में प्रति यूनिट इथेनॉल अधिक है। विशेषज्ञों का मानना है कि टैक्स सीधे ‘अल्कोहल सामग्री’ (Alcohol Content) पर होना चाहिए, ताकि लोग कम नशीले पेय पदार्थों की ओर प्रेरित हों।

परीक्षा के लिए महत्वपूर्ण प्रश्नोत्तर (Q&A)

प्रश्न 1: शराब पर ‘एक्साइज ड्यूटी’ (Excise Duty) वसूलने का अधिकार किसके पास है? उत्तर: राज्य सरकारों के पास (यह राज्य सूची का विषय है)।

प्रश्न 2: ‘पिगौवियन सिद्धांत’ (Pigouvian Principle) क्या है? उत्तर: हानिकारक वस्तुओं पर उनके द्वारा समाज को पहुँचाए गए नुकसान की भरपाई के लिए लगाया जाने वाला टैक्स।

प्रश्न 3: शराब के उत्पादन और गुणवत्ता मानकों को भारत में कौन नियंत्रित करता है? उत्तर: FSSAI (भारतीय खाद्य सुरक्षा और मानक प्राधिकरण)।

प्रश्न 4: शराब नीति में ‘नेगेटिव एक्सटर्नलिटी’ (Negative Externality) का क्या अर्थ है? उत्तर: वह नुकसान जो उपभोक्ता के अलावा समाज को भुगतना पड़ता है (जैसे सड़क दुर्घटनाएं)।

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