डीएनए पैकिंग में छोटे बदलाव जीन को ऑन या ऑफ कैसे कर सकते हैं

डीएनए पैकिंग में छोटे बदलाव जीन को ऑन या ऑफ कैसे कर सकते हैं

डीएनए पैकिंग में छोटे बदलाव जीन को ऑन या ऑफ कैसे कर सकते हैं

हमारी हर कोशिका के नाभिक में लगभग 2 मीटर लंबा डीएनए होता है, जो एक बहुत छोटे स्थान में पैक होकर रखा जाता है। यह पैकिंग सिर्फ जगह बचाने के लिए नहीं होती, बल्कि यह तय करती है कि कौन से जीन सक्रिय होंगे और कौन से बंद रहेंगे। हालिया शोध से पता चला है कि डीएनए की इस पैकिंग में बहुत छोटे बदलाव – बिना डीएनए अनुक्रम में कोई परिवर्तन किए – जीन की अभिव्यक्ति को पूरी तरह नियंत्रित कर सकते हैं।

डीएनए की सेलुलर पैकिंग इलस्ट्रेशन
चित्र स्रोत: Science Photo Library (sciencephoto.com)
डीएनए पैकिंग की संरचना
चित्र स्रोत: Lumen Learning

डीएनए हिस्टोन प्रोटीन के चारों ओर लपेटकर न्यूक्लियोसोम बनाता है। ये न्यूक्लियोसोम लिंकर डीएनए से जुड़े रहते हैं और पूरी संरचना को क्रोमेटिन कहते हैं। क्रोमेटिन की संरचना ढीली हो तो जीन सक्रिय होते हैं, क्योंकि ट्रांसक्रिप्शन मशीनरी आसानी से पहुंच जाती है। घनी संरचना में जीन बंद रहते हैं।

हिस्टोन और न्यूक्लियोसोम संरचना
चित्र स्रोत: National Human Genome Research Institute (genome.gov)
क्रोमेटिन फाइबर और हिस्टोन प्रोटीन
चित्र स्रोत: Britannica
क्रोमेटिन संरचना
चित्र स्रोत: National Human Genome Research Institute (genome.gov)

शोध में पाया गया कि लिंकर डीएनए की लंबाई में मात्र 5 बेस पेयर का अंतर ही क्रोमेटिन की भौतिक विशेषताओं को बदल देता है। छोटे लिंकर पर क्रोमेटिन घना और कम तरल होता है, जबकि लंबे लिंकर पर यह ज्यादा तरल और गतिशील बनता है। यह बदलाव डीएनए की सर्पिल प्रकृति के कारण न्यूक्लियोसोम की दिशा को प्रभावित करता है।

लिंकर हिस्टोन का प्रभाव
चित्र स्रोत: Nature

यह प्रक्रिया एपिजेनेटिक्स का हिस्सा है, जहां जीन नियंत्रण बिना डीएनए सीक्वेंस बदले होता है। क्रोमेटिन एक स्व-संघटित संरचना की तरह काम करता है, जहां भौतिक नियम खुद पैटर्न बनाते हैं।

एपिजेनेटिक तंत्र डायग्राम
चित्र स्रोत: Wikipedia
यूकेरियोटिक एपिजेनेटिक जीन रेगुलेशन
चित्र स्रोत: Lumen Learning

ऐसे छोटे बदलाव कोशिका के प्रकार, विकास और रोगों (जैसे कैंसर) में बड़ी भूमिका निभाते हैं। दोहराव वाले डीएनए क्षेत्रों में पैकिंग गड़बड़ी जीनोम को अस्थिर कर सकती है।

यह जानकारी हमें बताती है कि हमारा जीनोम सिर्फ अनुक्रम से नहीं, बल्कि उसकी त्रि-आयामी पैकिंग से भी नियंत्रित होता है। भविष्य में इससे नए उपचार विकसित हो सकते हैं।

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