लगभग दो दशक पहले 2008 में हुए भारत-अमेरिका परमाणु समझौते ने जो सपना दिखाया था, वह अब हकीकत बनने जा रहा है। भारत ने अपने परमाणु ऊर्जा क्षेत्र को निजी और विदेशी निवेश के लिए खोल दिया है। दिसंबर 2025 में पारित नए कानून के साथ, भारत का लक्ष्य 2047 तक अपनी परमाणु क्षमता को 9 गीगावाट से बढ़ाकर 100 गीगावाट करना है।
क्या बदला है? पुराने कानून में विदेशी कंपनियों के लिए ‘लायबिलिटी’ (Liability) यानी दुर्घटना की जिम्मेदारी के नियम बहुत कड़े थे, जिससे विदेशी निवेश रुका हुआ था। अब नए कानून ने इसे अंतरराष्ट्रीय मानकों के अनुरूप बनाया है, जहाँ दुर्घटना की प्राथमिक जिम्मेदारी ऑपरेटर की होगी, सप्लायर की नहीं।
प्राइवेट निवेश और सुरक्षा: अडानी समूह जैसे बड़े औद्योगिक घराने अब उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों में ‘स्मॉल मॉड्यूलर रिएक्टर्स’ (SMR) लगाने की संभावना तलाश रहे हैं। हालाँकि, निजीकरण के साथ सरकार के सामने सबसे बड़ी चुनौती सख्त रेगुलेशन की होगी। परमाणु ऊर्जा में चूक की कोई गुंजाइश नहीं होती, इसलिए एक स्वतंत्र और शक्तिशाली नियामक संस्था की आवश्यकता पहले से कहीं अधिक है।
परीक्षा के लिए महत्वपूर्ण प्रश्नोत्तर (Q&A)
प्रश्न 1: भारत ने वर्ष 2047 तक कितनी परमाणु ऊर्जा क्षमता हासिल करने का लक्ष्य रखा है?उत्तर: 100 गीगावाट (100 GW)।
प्रश्न 2: भारत-अमेरिका असैन्य परमाणु समझौता (Civil Nuclear Deal) किस वर्ष हुआ था?उत्तर: वर्ष 2008 में।
प्रश्न 3: भारत की वर्तमान परमाणु ऊर्जा हिस्सेदारी कुल बिजली उत्पादन में लगभग कितनी है?उत्तर: लगभग 3 प्रतिशत।
प्रश्न 4: नए परमाणु कानून में ‘लायबिलिटी’ का मुख्य उत्तरदायित्व किस पर रखा गया है?उत्तर: प्लांट ऑपरेटर पर।
