वाराणसी और दिल्ली जैसे शहरों में जब प्रदूषण का स्तर बढ़ता है, तो हम अक्सर टीवी और मोबाइल पर ‘एक्यूआई’ (AQI) के आंकड़े देखते हैं। लेकिन काशी हिंदू विश्वविद्यालय (BHU) और आईआईटी दिल्ली के ताजा संयुक्त शोध ने एक डरावनी तस्वीर पेश की है। शोध के अनुसार, वर्तमान में जिस वायु गुणवत्ता सूचकांक (AQI) का हम उपयोग कर रहे हैं, वह स्वास्थ्य के वास्तविक खतरों को बताने में पूरी तरह सक्षम नहीं है। यह सूचकांक केवल यह बताता है कि हवा में धूल के कण कितने हैं, लेकिन यह नहीं बताता कि वह हवा आपकी जान लेने के कितने करीब है।
शोधकर्ताओं का तर्क है कि भारत जैसे विशाल देश में हर शहर की भौगोलिक स्थिति और लोगों की जीवनशैली अलग है। वाराणसी में प्रदूषण का जो स्तर 0.17% मृत्यु दर बढ़ाता है, वही स्तर दिल्ली में अलग प्रभाव डाल सकता है। अध्ययन में पाया गया कि पीएम 2.5 (PM2.5) का औसत स्तर वाराणसी में 110 और दिल्ली में 141 दर्ज किया गया, जो डब्ल्यूएचओ के सुरक्षित मानक (15) से लगभग 7 से 9 गुना अधिक है। ओजोन और नाइट्रोजन डाइऑक्साइड जैसे प्रदूषक तत्व कम मात्रा में होने के बावजूद हृदय और फेफड़ों की बीमारियों से होने वाली मौतों का मुख्य कारण बन रहे हैं।
विशेषज्ञों ने सरकार से ‘एयर क्वालिटी हेल्थ इंडेक्स’ (AQHI) अपनाने की पुरजोर वकालत की है। यह नया पैमाना केवल प्रदूषण के आंकड़े नहीं देगा, बल्कि यह बताएगा कि किसी विशेष दिन हवा आपके लिए कितनी जानलेवा है। इससे आम आदमी को अपनी गतिविधियों को नियंत्रित करने और सरकार को स्वास्थ्य नीतियों को बेहतर बनाने में मदद मिलेगी।
परीक्षा के लिए महत्वपूर्ण प्रश्नोत्तर (Q&A)
प्रश्न 1: BHU और IIT दिल्ली के शोध के अनुसार, प्रदूषण के वास्तविक स्वास्थ्य प्रभावों को मापने के लिए किस नए इंडेक्स का सुझाव दिया गया है? उत्तर: एयर क्वालिटी हेल्थ इंडेक्स (AQHI)।
प्रश्न 2: विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के अनुसार PM2.5 का 24 घंटे का सुरक्षित मानक क्या निर्धारित किया गया है? उत्तर: 15 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर।
प्रश्न 3: शोध में पीएम 2.5 के अलावा किन अन्य प्रदूषकों को मृत्यु दर बढ़ाने के लिए जिम्मेदार माना गया है? उत्तर: ओजोन (O3) और नाइट्रोजन डाइऑक्साइड (NO2)।
प्रश्न 4: मौजूदा AQI सिस्टम को ‘भ्रामक’ क्यों कहा गया है? उत्तर: क्योंकि यह भौगोलिक स्थिति और आबादी की स्वास्थ्य संवेदनशीलता के अंतर को नजरअंदाज करता है।
