अबू धाबी/वॉशिंगटन: चिकित्सा विज्ञान के लिए साल 2026 एक ऐतिहासिक मोड़ साबित हो रहा है। जहाँ एक ओर अबू धाबी ने ‘ITVISMA’ जीन थेरेपी के जरिए दुनिया को चौंका दिया है, वहीं दूसरी ओर ‘व्यक्तिगत जीन एडिटिंग’ (Personalized Gene Editing) ने लाइलाज बीमारियों के इलाज की नई राह खोल दी है।
1. ITVISMA जीन थेरेपी: अबू धाबी का वैश्विक रिकॉर्ड
28 दिसंबर, 2025 को अबू धाबी के शेख खलीफा मेडिकल सिटी (SKMC) ने स्पाइनल मस्कुलर एट्रोफी (SMA) के मरीज को दुनिया की पहली ITVISMA जीन थेरेपी देकर इतिहास रच दिया।
- क्या है खास: नोवार्टिस (Novartis) द्वारा विकसित यह थेरेपी ‘जीन रिप्लेसमेंट’ तकनीक पर आधारित है। यह शरीर में दोषपूर्ण SMN1 जीन को एक स्वस्थ कॉपी से बदल देती है।
- उम्र की बाधा खत्म: अब तक SMA के उपचार केवल शिशुओं (2 वर्ष से कम) तक सीमित थे, लेकिन ITVISMA को 2 वर्ष से अधिक उम्र के बच्चों और वयस्कों के लिए भी मंजूरी मिल गई है।
- सिंगल डोज मैजिक: यह एक बार दी जाने वाली (One-time) खुराक है, जो मरीज को आजीवन दवाओं पर निर्भरता से मुक्ति दिला सकती है।
2. विश्व की पहली व्यक्तिगत (Personalized) CRISPR थेरेपी
हाल ही में चिकित्सा जगत में एक और बड़ी उपलब्धि दर्ज की गई जब CPS1 डेफिशियेंसी (एक दुर्लभ मेटाबोलिक विकार) से पीड़ित एक बच्चे का इलाज ‘पर्सनलाइज्ड’ CRISPR तकनीक से किया गया।
- बेशपोक (Bespoke) मेडिसिन: यह थेरेपी विशेष रूप से उस एक मरीज के जेनेटिक कोड को ध्यान में रखकर लैब में तैयार की गई थी।
- लीवर की सुरक्षा: CPS1 विकार में शरीर अमोनिया को नहीं तोड़ पाता, जिससे दिमाग को गंभीर नुकसान पहुँचता है। इस व्यक्तिगत थेरेपी ने मरीज के लीवर में जाकर सीधे उस खराब डीएनए सीक्वेंस को ‘एडिट’ कर दिया।
जीन एडिटिंग बनाम जीन रिप्लेसमेंट: अंतर समझें
| विशेषता | ITVISMA (जीन रिप्लेसमेंट) | CRISPR (जीन एडिटिंग) |
| प्रक्रिया | खराब जीन की जगह नया जीन डालना। | मौजूदा डीएनए के खराब हिस्से को काटकर सुधारना। |
| उपकरण | एडेनो-एसोसिएटेड वायरस (AAV) वेक्टर। | CRISPR-Cas9 (आणविक कैंची)। |
| लक्ष्य | स्पाइनल मस्कुलर एट्रोफी (SMA)। | दुर्लभ आनुवंशिक विकार (जैसे CPS1, सिकल सेल)। |
जीन एडिटिंग की दो प्रमुख श्रेणियाँ
- सोमैटिक (Somatic): यह शरीर के अंगों (लीवर, फेफड़े) की कोशिकाओं में बदलाव करती है। यह केवल मरीज तक सीमित रहता है, अगली पीढ़ी में नहीं जाता।
- जर्मलाइन (Germline): यह भ्रूण या प्रजनन कोशिकाओं में बदलाव करती है, जिससे यह बदलाव वंशानुगत हो जाते हैं। (यह वर्तमान में नैतिक कारणों से प्रतिबंधित है)।
भविष्य की राह और चुनौतियाँ
इन उपचारों की सफलता ने ‘सटीक चिकित्सा’ (Precision Medicine) के द्वार खोल दिए हैं। हालाँकि, ITVISMA जैसी थेरेपी की लागत (करीब 2 मिलियन डॉलर) एक बड़ी चुनौती है। अबू धाबी के स्वास्थ्य विभाग के अनुसार, यह उपलब्धि न केवल दुर्लभ बीमारियों के इलाज के लिए महत्वपूर्ण है, बल्कि यह नॉलेज डिप्लोमेसी और वैश्विक स्वास्थ्य सुरक्षा में यूएई की अग्रणी भूमिका को भी दर्शाती है।
अब डॉक्टर केवल बीमारी के लक्षणों का इलाज नहीं कर रहे, बल्कि बीमारी की जड़ यानी ‘जेनेटिक कोडिंग’ को ही ठीक कर रहे हैं। आने वाले समय में कैंसर और सिकल सेल जैसी बीमारियों के लिए भी ऐसी ही व्यक्तिगत थेरेपी सामान्य हो सकती हैं।
